भोपाल: देश की सीमाओं पर हिमालय की ऊंची चोटियों और ग्लेशियरों में तैनात सैनिकों को कठिन मौसम और कम ऑक्सीजन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों में जवानों की शारीरिक और मानसिक क्षमता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एम्स भोपाल और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने संयुक्त अनुसंधान और तकनीकी सहयोग के लिए समझौता (MoU) किया है। इस पहल का उद्देश्य ऐसी आधुनिक तकनीक और स्वास्थ्य समाधान विकसित करना है, जिससे कठिन इलाकों में भी सैनिक पूरी तरह फिट और मिशन के लिए तैयार रह सकें।
कठिन परिस्थितियों में जवानों की फिटनेस बढ़ाने पर रहेगा फोकस
इस साझेदारी के तहत दोनों संस्थान मिलकर ऐसे उपकरण, चिकित्सा तकनीक और वैज्ञानिक समाधान विकसित करेंगे, जो ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिकों की शारीरिक और मानसिक क्षमता को बेहतर बनाए रखने में मदद करेंगे। अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और लगातार तनाव जैसी परिस्थितियों का जवानों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी किया जाएगा, ताकि उनके लिए अधिक प्रभावी स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली तैयार की जा सके।
एम्स की चिकित्सा विशेषज्ञता और DRDO की तकनीक का होगा समन्वय
एम्स भोपाल के अधिकारियों के अनुसार, संस्थान की क्लीनिकल विशेषज्ञता और DRDO की तकनीकी क्षमता मिलकर सैनिकों के लिए नई स्वास्थ्य तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इस सहयोग के जरिए ऐसे नवाचार विकसित किए जाएंगे जो न केवल जवानों की जान बचाने में सहायक होंगे, बल्कि उनकी कार्यक्षमता और ऑपरेशनल क्षमता को भी बढ़ाएंगे।
अत्याधुनिक लैब में होगा शोध और परीक्षण
एम्स भोपाल में मस्तिष्क, हृदय, फेफड़ों और शारीरिक-मानसिक फिटनेस की जांच के लिए आधुनिक प्रयोगशालाएं पहले से उपलब्ध हैं। इन सुविधाओं का उपयोग संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं में किया जाएगा। बताया गया है कि कुछ समय पहले DRDO के विशेषज्ञों ने इन प्रयोगशालाओं का निरीक्षण किया था और परियोजना की आवश्यकताओं के अनुरूप पाए जाने के बाद दोनों संस्थानों के बीच सहयोग का निर्णय लिया गया।
रक्षा क्षेत्र में स्वास्थ्य अनुसंधान को मिलेगा नया आयाम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी केवल सैनिकों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य में उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कार्य करने वाले अन्य सुरक्षा बलों और आपदा राहत टीमों के लिए भी उपयोगी तकनीक विकसित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इस पहल से भारत के रक्षा स्वास्थ्य अनुसंधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।










